तर्ज : त्रिशला नंद कुमार…
ध्रुव परमातम सार, ध्याओ-ध्याओ-ध्याओ-ध्याओ, नित सुखकार।
निज शुद्धातम सार, भाओ-भाओ-भाओ-भाओ, नित अविकार।।
तन से न्यारा, मन से न्यारा, रागादिक कर्मों से न्यारा,
चिन्मूरत अविकार … ।।1।।
भव-भव का दुःख क्षण में नाशे, निरखत ज्ञानानन्द प्रकाशे।
महिमा अपरम्पार …।।2।।
नव तत्त्वों का स्वांग न जिसमें, शक्ति अनंत उछलती जिसमें ।
सो प्रभु तारणहार… ।।3।।
श्रद्धा का श्रद्धेय यही है, अनुभव करने योग्य यही है।
ध्येय सरस हितकार… ।।4।।
हेय रूप सब ही असार है, यही सार है समयसार है।
शिव स्वरूप शिवकार… ।।5।।
स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’