धिक्-धिक् जीवन समकित बिना ॥ टेक ॥
दान शील व्रत तप श्रुत पूजा, आतम हेत न एक गिना ॥1 ॥
ज्यों बिनु कंत कामिनी शोभा, अंबुज बिनु सरवर सूना।
जैसे बिना एकड़े बिंदी, त्यों समकित बिन सरव गुना ॥2 ॥
जैसे भूप बिना सब सेना, नींव बिना मंदिर चुनना।
जैसे चंद बिहुनी रजनी, इन्हें आदि जानो निपुना ॥3 ॥
देव जिनेन्द्र, साधु गुरु करुना, धर्मराग व्योहार भना।
निहचै देव धरम गुरु आतम, ‘द्यानत’ गहि मन वचन तना ॥4॥
स्रोत: मङ्गल भक्ति सुमन (२०२४), पृष्ठ १७४