धर्म बिना कोई नहीं अपना,
सब सम्पत्ति धन थिर नहिं जग में, जिसा रैन सपना ॥ टेक ॥
आगै किया सो पाया भाई, याही है निरना।
अब जो करैगा सो पावैगा, तातैं धर्म करना ॥1 ॥
ऐसे सब संसार कहत है, धर्म कियें तिरना।
परपीड़ा बिसनादिक सेवैं, नरकविर्षं परना ॥2॥
नृप के घर सारी सामग्री, ताकैं ज्वर तपना ।
अरु दारिद्रीकैं हू ज्वर है, पाप उदय थपना ॥3 ॥
नाती तो स्वारथ के साथी, तोहि विपत भरना।
वनगिरि सरिता अगनि युद्ध मैं, धर्महिका सरना ॥4॥
चित ‘बुधजन’ संतोष धारना, पर चिन्ता हरना।
विपति पड़ै तो समता रखना, परमातम जपना ॥5॥
स्रोत: मङ्गल भक्ति सुमन (२०२४), पृष्ठ १७३