धर्म बिन बावरे तू ने मानव रतन गंवाया
धर्म बिन बावरे तू ने मानव रतन गंवाया ॥ टेक ॥
कभी न कीना आत्म निरीक्षण, कभी न निज गुण गाया ।
पर परिणति से प्रीति बढ़ाकर काल अनन्त बढ़ाया ॥ १ ॥
यह संसार पुण्य-पापों का पुण्य देख ललचाया ।
दो हजार सागर के पीछे काम नहीं यह आया ॥ २ ॥
यह संसार भव समुद्र है वन विषयों हरषाया ।
ज्ञानी जन तो पार उतर गये मूरख रुदन मचाया ॥ ३ ॥
यह संसार ज्ञेय द्रव्य है आतम ज्ञायक गाया ।
कर्ता बुद्धि छोड़ दे चेतन नहीं तो फिर पछताया ॥४ ॥
यह संसार दृष्टि की माया अपना कर अपनाया ।
केवल दृष्टि सम्यक् कर ले कहान गुरु समझाया ॥ ५ ॥
स्रोत: आध्यात्मिक भजन संग्रह (सं. श्री सौभाग्यमल जैन, पं. टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर, २००६), भजन ७३ (विभिन्न कवियों के भजन)