धर्म भावना दशक | Dharm Bhavan Dasak

तर्ज-वेश दिगम्बर…

धर्म दिगम्बर जजो भव्य मंगलकारी।

धर्म दिगम्बर धरो भव्य आनंदकारी ।। टेक ।।

सम्यग्दर्शन ज्ञान-चरणमय, धर्म सर्व सुखदाता है।
परम अहिंसामयी धर्म ही, सर्व क्लेश विनशाता है।।1।।

वीतराग सर्वज्ञ जिनेश्वर, जिसके मूल प्रणेता हैं।
धन्य-धन्य निर्ग्रन्थ साधुवर, साधक अरु उपदेष्टा हैं।।2।।

दशलक्षण हैं अहो धर्म के, इनसे धर्मी पहिचानो।
एकदेश अरु सर्वदेश पहिचान, भव्य उद्यम ठानो ।।3।।

धर्मी बिना न धर्म कहीं हो, समझो अपने धर्मी को।
प्राणों से भी प्यारा समझो, बाहर में साधर्मी को।।4।।

साधर्मी की संगति में भी, सदा असंग प्रभु ध्याओ।
स्वानुभूति से धर्म प्रगट कर, तत्त्वभावना नित भाओ।।5।।

हिंसादिक पापों को त्यागो, परलक्षी सब भाव तजो।
ले जिनदीक्षा स्वाश्रय से ही, निश्चय आतम धर्म सजो ।।6।।

नहीं आडम्बर अरे धर्म में, साम्यभाव ही धर्म अहा।
वेश दिगम्बर भाव निरम्बर, स्वानुभूतिमय धर्म अहा।।7।।

श्रमणोपासक ही श्रावक है, सम्यग्दर्शन ज्ञान सहित।
यत्नाचार युक्त क्रिया हो, जिसकी सहज विवेक सहित ।।8।।

सब प्रकार अवसर है आया, अब तुम चूक नहीं जाना।
पक्षपात तज निर्णय करना, मुक्तिमार्ग में लग जाना।।9।।

बाहर तो क्लेशों का सागर, अन्तर ज्ञानानंद लसे।
ज्ञान ज्ञान में होय प्रतिष्ठित, सिद्धालय में सहज बसे ।।10 ।।

भक्ति-भावना 183


स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’
स्रोत: जिन-भक्ति सिंधु, पृष्ठ २६३ से २६४