धन्य प्रभो दर्शन कर मैं निज तत्त्व लखाया | dhanya prabho darshana kara maim nija tattva lakhaya

धन्य प्रभो दर्शन कर मैं निज तत्त्व लखाया।

निज से निज में शान्तिमयी शिव पंथ सुझाया।। 1।।

झूठी पर की आश मिटी, स्व-पर विवेक जगाया।
हो निशंक निज नाथ जिनेश्वर शीश नवाया।। 2।।

पामर परिणति होते भी, प्रभु रूप दिखावे ।
प्रभुता के आश्रय से, पामरता नश जावे ।। 3।।

पर्याय भी प्रभु बने, अलौकिक तत्त्व आपका।
हुआ आज विध्वंस दुखमय मोह पाप का ।। 4।।


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ३७
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’