तर्ज : ज्ञान ही सुख है …
धन्य कृतकृत्य हुआ, दर्श करके प्रभो।
आभा अद्भुत अलौकिक निहारी प्रभो।। टेक।।
हाथ पर हाथ कहते अकर्तृत्व को,
पद्म-आसन सिखाता है अचलत्व को।
दृष्टि नाशा कहे अन्तर में सुख अहो ।। 1।।
जाना निश्चय अहो ! देवों के देव हो,
जाना अन्तर में अपने परम देव को।
सत्य चिन्तामणि ही मिली है विभो।। 2।।
ब्रह्ममय तेजमय सहज आनन्दमय,
दिव्य मुद्रा लखे दूर हों सर्व भय।
मिटती इच्छायें ही देख तुमको अहो।। 3।।
छूटने योग्य सब छूट जाता सहज,
प्राप्ति के योग्य सब प्राप्त होता सहज।
दृष्टि होती स्वयं में स्वयं ही अहो ।। 4।।
पूर्व के कर्म हों निर्जरित सहज ही,
अरु नये कर्मों का होवे आस्रव नहीं।
परम निर्मल दशा हो प्रवाहित अहो ।। 5।।
भक्ति से हर्ष से शीस झुकता स्वयं,
भाव वैराग्यमय प्रभु सा जगता स्वयं ।
लीनता मग्नता हो स्वयं में अहो ।। 6।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ७७
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’