धन्य है स्वरूप प्रभु, धनि स्वरूप लीनता।
धन्य वीतरागता, धन्य सर्वज्ञता ।। टेक ।।
सहज ज्ञानगम्य प्रभु, ज्ञानमय स्वरूप है।
ज्ञानमयी परिणमन, परमानंद रूप है ।। 1।।
अहो ! कर्तृत्व शून्य, परम कृतकृत्य रूप ।
दिव्य रूप शान्तरूप, निर्विकल्प चित्स्वरूप ।। 2 ।।
विश्व रूप तेजपुंज, एक रूप ज्ञान रूप।
ध्येय रूप ज्ञेय रूप, सहज समयसार रूप।। 3।।
हेय रूप पक्ष शून्य, सहज आराध्य रूप।
दर्शकर देखते भव्य निज आत्म रूप।। 4।।
धन्य हुआ तृप्त हुआ, जिनराज दर्श से।
सहज पाऊँ प्रभु स्वरूप, परम आह्लाद से ।। 5।।
भावना यही सहज स्वरूप रमण हो प्रभो।
हूँ निःशंक शांत चित्त, भाव नमन हो प्रभो।। 6।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ४२
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’