तर्जः नित्य मुक्त शुद्धात्मा…
धन्य दिवस धनि घड़ी आज की, आनन्द अपरम्पार है।
प्रभु का दर्शन भक्ति करते, आनन्द अपरम्पार है।। टेक।।
अवसर जिनवर की भक्ति का, भाग्यवान् ही पाते हैं।
निकट भव्य तो निज दर्शन कर, सम्यक्त्वी हो जाते हैं ।। 1 ।।
सर्व विषमता मिटती,बहती निजानन्द रसधार है।
करना कुछ भी नहीं दिखावे, चित्त हुआ निर्धार है।। 2।।
अद्भुत शान्त छवि जिनवर की भेदज्ञान प्रगटाती है।
चरण-शरण में आकर वृत्ति, सहज शान्त हो जाती है ।। 3 ।।
प्रभुता तीन लोक से न्यारी, वचनों में कैसे आवे।
स्वानुभूति में प्रत्यक्ष दीखे, अद्भुत आनन्द उपजावे ।। 4।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ५७
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’