तर्जः निरखी-निरखी मनहर मूरत…
धन्य-धन्य वे ज्ञानी मुनिवर, वर्तें जो समभाव में।
धन्य-धन्य वे ज्ञानी मुनिवर, रमें सहज निज भाव में ॥ टेक ॥
पर भावों की मूर्च्छा त्यागी, रहें उदास शरीर से।
परम जितेन्द्रिय रहित अडम्बर, दूर रहें भव भीर से ॥
नहीं प्रयोजन जिन्हें जगत् से, रहें संतुष्ट स्वभाव में॥ 1 ॥
भिन्न रहें जो कर्मोदय से, ज्ञानोदय जिनके घट माँहि ।
निर्मोही मुनि बंध नशावें, पूर्व कर्म भी झड़ते जाँहि ॥
सहज तिरें भव सिन्धु जो, बैठे रत्नत्रय की नाव में॥ 2 ॥
रोवें और रुलावें मोही, सन्त सान्त्वना देते हैं।
स्व-पर भेद-विज्ञान करावें, सर्व क्लेश हर लेते हैं ॥
आओ बैठो अहो ! भव्य जन, गुरु चरणों की छाँव में ॥ 3 ॥
संत वचन ही परम औषधि, अमृत सम तृप्ति कारक।
भव-भय नाशक मुक्ति प्रकाशक, मंगलमय मंगल कारक ॥
निज में निश्चल हो रम जावें, तब कर्म स्वयं ही झड़ जावें ॥ 4 ॥
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १९३
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’