तर्जः धन्य-धन्य जिनवाणी…
धन्य-धन्य श्री पारस स्वामी, निज स्वरूप दरशायो है।
शिव स्वरूप दरशायो है, प्रभु स्वरूप दरशायो है।।
चित्स्वरूप दरशायो है, हो अद्वैत नमन हे स्वामी।
सविनय शीस नवायो है ।। टेक ।।
जीवादिक षट् द्रव्य बताये, उनके गुण-पर्यय समझाये।
अस्तिकाय जिन पाँच सु गाये, नव तत्त्वों के स्वांग दिखाये ।।
सबसे भिन्न परम ज्ञायक निज, आश्रय योग्य बतायो है ।। 1 ।।
दुःख का मूल मोह बतलाया, जगत् प्रपंच असार दिखाया।
हिंसादिक का त्याग कराया, परम अहिंसा धर्म बताया।।
सत्य पंथ निर्ग्रन्थ दिगम्बर, स्वानुभूतिमय गायो है।। 2।।
मुद्रा शान्त मनोहर सोहे, अन्तर्मुख सबका मन मोहे।
कमठ हुआ था निर्मद सत्वर, हो उपसर्गजयी हे जिनवर ।।
हुए तेईसवे तीर्थंकर प्रभु, समता पाठ पढ़ायो है।। 3।।
हम सब प्रभु तेरे अनुगामी, दशा आपकी हमको भायी।
मार्ग आपका हमें सुहाया, जग का नाटक हमें न भाया।।
रमें आपमें विभो आप सम, यही भाव उमगायो है ।। 4।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ११० से १११
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’