धन्य-धन्य निर्ग्रन्थ दशा है, परम धन्य निर्ग्रन्थ स्वरूप | dhanya dhanya nirgrantha dasha hai parama dhanya nirgrantha svarupa

धन्य-धन्य निर्ग्रन्थ दशा है, परम धन्य निर्ग्रन्थ स्वरूप।

जगत् पूज्य निर्ग्रन्थ दशा है, सहज पूज्य निर्ग्रन्थ स्वरूप ॥ टेक ॥
अहो ! सहज निर्ग्रन्थ स्वरूप, धन्य-धन्य निर्ग्रन्थ स्वरूप ।
पर भावों से शून्य सदा ही, स्वयं स्वयं में पूर्ण स्वरूप ॥ 1 ॥

अहो ! सहज निर्द्वन्द्व स्वरूप, धन्य निर्द्वन्द्व स्वरूप ।
सहजानंदमय परमानंदमय, ज्ञानानंदमय ब्रह्म स्वरूप ॥ 2 ॥

अहो ! सहज निर्मुक्त स्वरूप, धन्य-धन्य निर्मुक्त स्वरूप ।
बंध मुक्ति के स्वांगों से है भिन्न, सदा निर्मुक्त स्वरूप ॥ 3 ॥

अहो ! सहज परमात्म स्वरूप, धन्य-धन्य परमात्म स्वरूप ।
स्वाभाविक प्रभुता से मंडित, है शाश्वत भगवान् स्वरूप ॥ 4 ॥

अहो ! सहज प्रभु ज्ञायक रूप, धन्य-धन्य प्रभु ज्ञायक रूप ।
ज्ञेयों से निरपेक्ष ज्ञानमय, परम शुद्ध निर्भेद स्वरूप ॥ 5॥

महाभाग्य से पाया मैंने, उपादेय शुद्धात्म स्वरूप ।
तृप्त स्वयं में तुष्ट स्वयं में, रहूँ सहज कृतकृत्य स्वरूप ॥ 6 ॥

अहो ! सहज चैतन्य स्वरूप, धन्य-धन्य चैतन्य स्वरूप ।
चिदानंदमय निजानंदमय, रहूँ सदा चैतन्य स्वरूप॥ 7॥


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १९६ से १९७
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’