तर्ज : प्रभु हम सबका एक…
धन्य-धन्य मुनिराज रमें, निज में ही, निज में हो। ।टेक ।।
होय विरागी परिग्रह डारा, शुद्धोपयोग धर्म है धारा।
आतम रूप लखें निज में …।। 1 ।।
निर्मम शुद्ध परम अविकारी, नशे विभाव परिणति सारी।
पूरव कर्म झरै छिन में…।। 2।।
पद विरूद्ध क्रिया नहीं कोई, योग्य क्रिया भी सहजहिं होई ।
निष्क्रिय रूप लखें निज में… ।। 3 ।।
ग्रीष्म में पर्वत पर राजें, चित्स्वरूप में सहज विराजें।
शीतल शान्त रहें निज में… ।। 4।।
वर्षा ऋतु तरुवर के नीचे, धर्म वृक्ष को निश-दिन सींचें।
मुक्तिफल पावें निज में…।। 5।।
शीतकाल दरिया के किनारे, अपना ज्ञायक रूप सम्हारें ।
परमानन्द लहें निज में…।। 6।।
अद्भुत रत्नत्रय निधि धारी, हो अद्वैत नमन सुखकारी।
साधु दशा पाऊँ निज में…।।7।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ २२५ से २२६
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’