धन्य-धन्य कुन्दकुन्द, धन्य-धन्य आत्मा | dhanya dhanya kundakunda dhanya dhanya atma

धन्य-धन्य कुन्दकुन्द, धन्य-धन्य आत्मा।

जय-जय कुन्दकुन्द, जय-जय आत्मा ॥ टेक ॥
आत्मा आत्मा,
शाश्वत परमात्मा ।
ज्ञान मात्र आत्मा, ज्ञान घन आत्मा ॥
ज्ञान मूर्ति आत्मा, ज्ञानमय आत्मा।
परम पूज्य आत्मा, स्वयं सिद्ध
आत्मा ॥ 1॥

नित्य तीर्थ आत्मा, नित्य देव
आत्मा ।
नित्य तृप्त आत्मा, नित्य पूर्ण
आत्मा ॥
नीराग निर्द्वन्द्व, निःकषाय
आत्मा ।
ध्रुव रूप एक रूप, प्रभु रूप
आत्मा ॥ 2 ॥

स्वयं मुक्त सदा मुक्त, सहज मुक्त आत्मा ।
ध्येय श्रद्धेय, आराध्य एक आत्मा ॥
उपादेय एक मात्र, समयसार आत्मा ।
अमृतचन्द्र आत्मा, आनंदकंद आत्मा॥ ३॥

कुन्दकुन्द आचार्य देव, नैनों मांहि झूलते।
देखते-दिखाते हैं, परमार्थ आत्मा ॥
वंद्य-वंदक भाव भी, विलीन आज हो रहा।
ये ही गुरु वंदना, मैं हूँ सहज आत्मा ॥ 4॥


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ २४७ से २४८
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’