तर्ज : भोर भयो …
धन्य-धन्य जिनशासन पायो,
निज शुद्धातम ध्याऊँ रे।
निज शुद्धातम ध्याऊँ रे,
अजर अमर पद पाऊँ रे ।। टेक ।।
निज को भूल बहुत दुःख पाये,
अब इक क्षण न भुलाऊँ रे।
भेदज्ञान निज में ही प्रगट्यो,
निज में ही रम जाऊँ रे ।। 1 ।।
पाने योग्य स्वयं में पाया,
नहीं भव में भरमाऊँ रे।
रहूँ निराकुल सहज निस्पृही,
निज में तृप्त रहाऊँ रे।। 2।।
स्वयं सिद्ध निज प्रभुता पाई,
जाननहार रहाऊँ रे।
ध्येय रूप निज ध्याते-ध्याते,
सर्व विभाव विनशाऊँ रे ।। 3 ।।
स्वाभाविक अर्हत् पद पाऊँ
आवागमन मिटाऊँ रे ।
ध्रुव अनुपम अविकारी शिवपद,
मंगलमय प्रगटाऊँ रे।। 4।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ २५७
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’