तर्जः गुरु निर्ग्रन्थ परिग्रह त्यागी…
धन्य-धन्य जिनरूप अहो, धन्य-धन्य प्रभु रूप अहो।
भक्ति उर में सहज उमड़ती, दिखे सहज निज रूप अहो ।। टेक ।।
इन्द्रादिक गणधर आदिक, भक्ति आपकी गाते हैं।
हर्ष विभोर हुए चरणों में, विभुवर शीस नवाते हैं।। 1।।
जग में अनुपम तीर्थ आपका, महाभाग्य से पाया है।
अचल सिद्धपद तुम सा प्रगटे, प्रभु विश्वास जगाया है।। 2 ।।
अन्तर्दृष्टि करे प्रेरणा, अन्तर में सर्वस्व अहो ।
दुर्विकल्प सब ही दुखकारी, सहज पूर्ण चैतन्य प्रभो।। 3 ।।
नित्य निरंजन परम ज्योतिमय, ज्ञानानन्दमयी अभिराम ।
सहज नमन हो यही भावना, निज में ही पाऊँ विश्राम ।। 4 ।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ८४
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’