तर्जः आओ-आओ महावीर…
धन्य-धन्य भयो आज, देखे श्री जिनराज, देखे श्री जिनराज ।। टेक ।।
निज स्वभाव में ही मगन, परमानन्दमय देव।
मुद्रा सौम्य निहारते, नमे शीस स्वयमेव।। 1।।
इन्द्रादिक सेवत चरण, देखें जगत् असार ।
सहज चतुष्टयवान निज, शुद्धातम ही सार।। 2।।
समवशरण जिनदेव का, अद्भुत प्रभुता रूप।
धर्मतीर्थ प्रगटावता, ध्येय रूप चिद्रूप।। 3।।
ध्याऊँ अन्तर्मग्न हो, सहजपने निजभाव।
ज्ञायक हूँ ज्ञायक रहूँ, नाशें सर्व कुभाव।। 4।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ५९
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’