धन्य हैं मुनि मंगल दातार ।
धन्य गुरु शिव स्वरूप शिवकार।।टेक ।।
शुद्ध स्वरूप सदा मंगलमय, परिणति भी अविकार।
गुरुवर की मंगल वाणी से, होय तत्त्व निर्धार ।। 1 ।।
शुद्धातम की महिमा जागे, नशे मोह दुःखकार।
रागद्वेषमय दुर्विकल्प भी, दीखें नहीं लगार ।।2।।
स्वानुभूति हो ज्ञानमयी, परमानंद अपरम्पार ।
जगे परम पुरुषार्थ शीघ्र ही, होवें भव से पार ।।3।।
जाननहार स्वरूप अलौकिक, गुरुवर जाननहार।
निर्विकल्प परमार्थ नमन गुरु, रहूँ सु जाननहार । । 4 ।।
स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’
स्रोत: जिन-भक्ति सिंधु, पृष्ठ २२७