तर्ज : धन्य-धन्य है घड़ी…
धन्य घड़ी है, धन्य दिवस है, दर्शन पाये जिनवर के।
हुआ सहज कृतकृत्य तृप्त मैं, दर्शन पाये जिनवर के।। टेक।।
ज्यों दर्पण के सन्मुख आते, चेहरा बाहर का दिखता।
प्रभु के सन्मुख आते ही त्यों, आतम रूप सहज दिखता।।
उछले परमानंद प्रभो, दुख मिट जाते है भव भव के।।1।।
चित्स्वरूप की परम प्रतीति, अन्तर में प्रगटाती है।
सम्यग्ज्ञान कला भी निज में, सहज उदित हो जाती है ।।
सहज भावना बृद्धिंगत हो, व्रत धारण को मुनिवर के ।।2।।
वीतराग सर्वज्ञ हितंकर, मंगलमय लोकोत्तम जो।
इन्द्रादिक भी जिनको पूजें, उनकी महिमा गाने को।।
सहज शरण है परम शरण है, चरण-कमल श्री प्रभुवर के ।। 3 ।।
हुआ निःशंक और निर्वांछक, तुम समीप आकर स्वामी।
आप रहो आदर्श सहज, साधू मैं निज पद अभिरामी ।।
शीश नवाऊँ भक्तिभाव से, गुण गाऊँ नित विभुवर के ।।4।।
स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’
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