धन्य धन्य जिनवाणी माता, ज्ञायक रूप दिखाया है।
तीन लोक चूड़ामणि अद्भुत, ज्ञायक रूप दिखाया है।।टेक।।
नवतत्त्वों से न्यारा आतम, शुद्ध बुद्ध शाश्वत परमातम।
नित्य निरंजन चिन्मय अनुपम, ज्ञायक रूप दिखाया है।।1।।
अभूतार्थ व्यवहार बताया, शुद्धनय भूतार्थ जताया।
शुद्धनय का अवलम्बन लेकर, ज्ञायक रूप दिखाया है।।2।।
कर्मादिक का कथन कराया, पर न्यारा चेतन दरशाया।
आश्रय करने योग्य एक ही, ज्ञायक रूप दिखाया है।।3।।
बाह्य आचरण सबहि बतलाया, पर ज्ञायक को नहीं भुलाया।
अहो लीनता योग्य सहज, एक ज्ञायक रूप दिखाया है।।4।।
जो भूले उन्हीं दुःख पाया, जिन ध्याया तिन शिवपद पाया।
उनकी जीवन गाथा में भी, ज्ञायक रूप दिखाया है ।।5।।
आज सुनहरा अवसर आया, जिनवाणी उपदेश सुहाया।
सम्यक् श्रद्वा भक्ति सहित मैं, सविनय शीश झुकाया है।।6।।
स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’
स्रोत: जिन-भक्ति सिंधु, पृष्ठ १६९ से १७०