धनि मुनि जिन यह, भाव पिछाना | Dhani Muni Jin Yah Bhav Pichhana

धनि मुनि जिन यह, भाव पिछाना

धनि मुनि जिन यह, भाव पिछाना ।।
तनव्यय वांछित प्रापति मानी, पुण्य उदय दुख जाना ।।धनि.।।

एकविहारी सकल ईश्वरता, त्याग महोत्सव माना ।
सब सुखको परिहार सार सुख, जानि रागरुष भाना ।।१।। धनि. ।।

चित्स्वभावको चिंत्य प्रान निज, विमल ज्ञानदृगलाना ।
‘दौल’ कौन सुख जान लह्यो तिन, करो शांतिरसपाना ।।२।। धनि. ।।


Artist: कविवर श्री दौलत राम जी
स्रोत: दौलत भजन सौरभ, पृष्ठ ६४

अर्थ

धन्य हैं वे मुनि जिनने यह भाव स्वीकार किया, माना-पहिचानना। जिनने देह की वांछित समाप्ति, जिसके पश्चात् पुनः देह धारण न करना पड़े, उसे अपना लक्ष्य माना, प्राप्ति मानी और पुण्य-उदय अर्थात् कर्म शृंखला को दुःख स्वरूप जाना। जिनने प्रभुता को त्यागकर, अकेले विचरने के अवसर को महोत्सव स्वरूप माना अर्थात् मुनि दीक्षा धारण की और राग-द्वेष को समझकर, उनसे युक्त सब्ब सांसारिक सुखों को छोड़ने में ही सुख का सार देखा, वे मुनि धन्य हैं। जिनने चैतन्य स्वभाव का चिंतन कर अपने जीवन को सम्यक्दर्शन-ज्ञान से युक्त किया। दौलतराम कहते हैं कि शांति रस की प्राप्ति हेतु ऐसा कौनसा सुख है जो उनको प्राप्त नहीं हुआ हो।

स्रोत: दौलत भजन सौरभ, पद 46।

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