तर्ज : धनि मुनिराज हमारे हैं …
धनि जिनधर्म हमारा है ।। टेक ।।
वस्तु स्वभाव धर्म आनन्दमय,
नहीं कुल पक्ष सहारा है।
सम्यग्दर्शन मूल धर्म का,
भेद-विज्ञान आधारा है।। 1 ।।
है साक्षात् धरम चारित्र सु,
वीतराग अविकारा है।
परम अहिंसा धर्म ही जानो,
निज पद को हितकारा है ।। 2 ।।
है सर्वज्ञ प्रणीत अनादि,
अनन्त सुमंगलकारा है ।
भव दुखों से सहज छुड़ाकर,
उत्तम सुख दातारा है।। 3।।
दशलक्षणमय भाव आपका,
पर भावों से न्यारा है ।
धर्मी शुद्धातम के आश्रय से,
प्रगटे सुखकारा है।। 4।।
अशरण जग में यही शरण है,
स्वारथ का संसारा है ।
धारो-धारो उत्तम अवसर,
पाओ सुख अविकारा है ।। 5 ।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ २५५ से २५६
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’