तर्जः पतित पावन तरन तारन मेरी…
देव दर्शन हुए मुझको, सहज आनन्द छाया है।
आज संसार सागर का, किनारा पास आया है।। टेक।।
अनन्तों पर्यायों में प्रभु भूल निज को मैं भटका हूँ।
सुखों की आश ले लेकर, कंटकों में ही अटका हूँ।।
विषय अंगारों से झुलसित, शरण बस प्रभु को पाया है।। 1 ।।
गुरु गम्भीर वाणी सुन, मैं सच्चा मार्ग पाया है।
है शुद्धातम ही इक शरण, आज विश्वास आया है।।
रत्नत्रय मार्ग ही है श्रेय, अब निज रूप भाया है।। 2।।
आत्म परिचय बिना विभुवर, पराये मोह में अटका।
विषय किंपाक में रीझा, चाह की दाह में झुलसा ।।
अब अन्तस्तल में शाश्वत, सत्य का आलोक पाया है ।। 3 ।।
सभी चेतन-अचेतन परिणमन, स्व-स्व में ही करते।
फटे में टाँग उलझाकर, व्यर्थ ही आहें हम भरते ।।
अकर्तृत्व रूप ज्ञायक लख, दुःख सब ही पलाया है।। 4 ।।
कहाँ अक्षय निधि मेरी, कहाँ पर्यय विनाशी है।
कहाँ त्रिकाल सुखमय ध्रुव, कहाँ पर्यय जरा सी है।।
परिणति तुच्छ अति भासी, स्व का माहात्म्य आया है।। 5 ।।
धन्य हैं वे ऋषि ज्ञानी, निहारें शान्त ज्ञायक जो।
असीमित सुख प्रकट होता, रहें निज में ही स्थिर जो ।।
जिन्होंने मोही भव्यों को, ज्ञान दीपक दिखाया है।। 6।।
हे भगवन् एक ही है चाह, परम ज्ञायक में रम जायें।
शीघ्र कल्पित विकारों पर, प्रभु सम हम विजय पायें।।
धन्य प्रभु रूप मंगलमय, शीश सविनय नवाया है।। 7।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ३३ से ३४
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’