देख्यो री! कहीं नेमिकुमार | Dekhyo Ri Kahin Nemikumar

देख्यो री! कहीं नेमिकुमार

देख्यो री! कहीं नेमिकुमार ।।
नैंननि प्यारो नाथ हमारो, प्रान-जीवन प्रानन-आधार ।।देख्यो.।।

पीव वियोग विथा बहु पीरी, पीरी भई हलदी उनहार ।
होउं हरी तबही जब भेटों, श्यामवरन सुन्दर भरतार ।।१।। देख्यो. ।।

विरह नदी असराल बहै उर, बूढ़त हौं यामें निरधार ।
‘भूधर’ प्रभु पिय खेवटिया बिन, समरथ कौन उतारनहार ।।२।। देख्यो. ।।


Artist: पं. श्री भूधरदास जी
स्रोत: भूधर भजन सौरभ, पृष्ठ १५

अर्थ

राजुल अपनी सखी से अपने प्रिय नेमिकुमार के बारे में पूछती है - हे सखी ! क्या कहीं नेमिकुमार को देखा है? नैनों को प्यारे लगनेवाले वे हमारे स्वामी हमारे प्राण हैं, जीवन हैं, प्राणों के आधार हैं।

राजुल को प्रियतम की वियोग व्यथा अत्यन्त पीड़ादायक है, दुःखदायक है, उस वियोग में वह हल्दी के समान पीली पड़ गई है। श्याम वर्ण के सुन्दर प्रियतम से भेंट होने पर ही वह हरी हो सकती है अर्थात् तब ही वह प्रसन्नता पुनः लौट सकती है, प्राप्त हो सकती है।

विरह-विछोह की गहनता में, अथाह प्रवाह/नदी में निराधार (यह आधारहीन) हृदय डूब रहा है, विकल हो रहा है। भूधरदास कहते हैं कि प्रभु प्रियतम के सिवा इस दुखसागर से पार उतारने में अन्य कोई खेवटिया नहीं है, अन्य कोई समर्थ नहीं है।

शब्दार्थ: पीरी = पीड़ा की। पीरी = पीली। उनहार = समान। असराल = अथाह। बूढ़त = डूबना।

स्रोत: भूधर भजन सौरभ, पद 14।

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