तर्ज : मैया त्रिशला तेरो लाल…
देखो सिद्धचक्र का पाठ, मुक्तिमार्ग दिखाता है।। टेक ।।
सिद्धप्रभु ज्यों अशरीरी हैं, त्यों शरीर से भिन्न।
निज शुद्धातम की श्रद्धा से, मोह पलाता है ।। 1 ।।
सिद्धप्रभु ज्ञाता स्वरूप त्यों, मैं भी ज्ञातारूप ।
ज्ञाता होकर देखा तो, ज्ञाता ही दिखाता है ।।2।।
स्वयं स्वयं में सुखी सिद्धप्रभु, त्यों ही आतमराम ।
स्वाश्रय से ही होऊँ सुखी, यह निश्चय आता है।।3।।
सिद्धदशा आतम दर्शन, अनुभव थिरता का ही फल।
देख अहो शुद्धातम का, महात्म्य सु-आता है।।4।।
तीनलोक में शुद्धातम ही, सर्वोत्कृष्ट प्रभु है।
जो ध्यावे वह स्वयं सिद्धपद निश्चय पाता है।।5।।
व्यर्थ न भटकूं यत्र तत्र, अब निज में ही रम जाऊँ।
रहूँ स्वयं में तृप्त, यही एक भाव सुहाता है ।।6।।
स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’
स्रोत: जिन-भक्ति सिंधु, पृष्ठ २७८