देखो रे मेला, झूठा ये मेला | dekho re mela jhutha ye mela

तर्ज : रे मन मुसाफिर …

देखो रे मेला, झूठा ये मेला।

आया अकेला तू, जाये अकेला।। टेक।।

चिर से पिये है महा-मोह डाला।
पापों से परिणति को, करता है काला ।।
चहुँगति भटकता, असह्य दुःख सहता।
जाना नहीं किन्तु पर का झमेला।। 1।।

सौभाग्य से श्रेष्ठ जिनधर्म पाया।
विस्मय है विषयों में अवसर गँवाया ।।
समय रहते चेतो ! स्वयं को पिछानो ।
विनशेगा क्षण में, निमित्तों का खेला ।। 2 ।।

जिससे रहा आज तक तू विमुख है।
संकेत प्रभुवर का ध्रुव की तरफ है।।
सर्वथा बंद करके ये पर्याय चक्षु।
अहो शुद्ध ज्ञायक के अनुभव की बेला ।। 3 ।।


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ३९७
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’