तर्जः गहरी गहरी नदियाँ नाव बीच धारा है…
देखो मुनिराज निज ध्यान में मगन,
ध्यान में मगन, निज ज्ञान में मगन ।
ज्ञान में मगन, आनंद में मगन,
आनंद में मगन, निज आतम में मगन ॥ टेक ॥
विषयों की चाह की दीनता नहीं,
परिग्रह और आरम्भ हैं ही नहीं।
निर्विकार परम शांत तन है नगन ॥ 1 ॥
तत्त्वों का श्रद्धान सम्यक् है जिनको,
आतम का अनुभव, सद्ज्ञान जिनको।
चारित्र सम्यक् निष्पाप मन ॥ 2 ॥
अद्भुत है समता, अद्भुत है प्रभुता,
अद्भुत है लघुता, अद्भुत है गुरुता।
द्रव्यदृष्टि सम वृत्ति जिनकी पावन ॥ 3 ॥
पीछी कमण्डल समीप रखे हैं,
अत्यन्त निर्मम हो निज में रमे हैं।
इन्द्रादि भी जिनका करते भजन ॥ 4 ॥
पुरुषार्थ ऐसा हमारे भी होवे,
पूज्य जिन मुद्रा हमारी भी होवे।
कर्मों को नाश मेटें आवागमन ॥5॥
क्षण-क्षण याद आवे ललचावे मन,
आत्मा हमारा भी नित ज्ञान घन।
भाव वन्दना ऐसा हो अनुभवन ॥ 6 ॥
भगवान् आत्मा, शाश्वत परमात्मा,
कारण परमात्मा, सहज शुद्ध आत्मा ।
निरपेक्ष तृप्ति हो, निज में मगन ॥7॥
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १८८ से १८९
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’