देखो! भाई श्रीजिनराज विराजैं
देखो! भाई श्रीजिनराज विराजैं ॥टेक॥
कंचनमनिमय सिंहपीठ पर, अन्तरीछ प्रभु छाजै ॥
तीन छत्र त्रिभुवन जस जपैं, चौंसठि चमर समाजैं ।
बानी जोजन घोर मोर सुनि, डर अहि पातक भाजैं ॥
देखो! भाई श्रीजिनराज विराजैं ॥१॥
साढ़े -बारह कोड़ दुंदुभी, आदिक बाजे बाजैं ।
वृक्ष अशोक दिपत भामण्डल, कोड़ि सूर शशि लाजैं ॥
देखो! भाई श्रीजिनराज विराजैं ॥२॥
पहुपवृष्टि जलकन मंद पवन, इंद्र सेव नित साजैं ।
प्रभु न बुलावै ‘द्यानत’ जावैं, सुरनर पशु निज काजैं ॥
देखो! भाई श्रीजिनराज विराजैं ॥३॥
Artist: पं. द्यानतराय जी
स्रोत: nikkyjain.github.io (पं द्यानतराय कृत भजन)
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