देखो ! अन्तर माँहि विराजे आतम देव महान्।
विलसे परमानन्द अम्लान ।।
जिनवृष पाया, अवसर आया, प्रगटे सम्यक्ज्ञान।। टेक ।।
जिनवर दर्शन मंगलकारी, ज्ञानाभ्यास सर्व दुःखहारी।
भेद-विज्ञान कला सुखकारी, दर्शावे निज निधि अविकारी ।।
प्रगटे अन्तर्मुख होते ही रत्नत्रय सुखखान।। 1।।
रागादिक घटते ही जावें, इन्द्रिय विषय न मन को भावें।
स्वाश्रय से वैराग्य बढ़ावें, धनि निर्ग्रन्थ दशा प्रगटावें ।।
ऐसा निर्मल आत्मध्यान हो, हो कर्मों की हानि ।। 2।।
देखो ! प्रभु निज आतम ध्याया, त्रिजग पूज्य अरहंत पद पाया।
इन्द्रादिक ने शीश नवाया, समवशरण का ठाठ रचाया।।
दिव्यध्वनि में ध्वनित हुआ है, आतम सिद्ध समान।। 3।।
आत्मतत्त्व सा तत्त्व नहीं है, आश्रय करने योग्य यही है।
धर्मी से हो धर्म सही है, धोखा इसमें कभी नहीं है ।।
ध्याओ-ध्याओ परम भाव को, बनो स्वयं भगवान्।। 4।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ३६७ से ३६८
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’