देखो अहो देखो, सहज चैतन्य रत्नाकर
देखो अहो देखो, सहज चैतन्य रत्नाकर ।
देखो अहो देखो, अनन्तों धर्मों का आकार ।।टेक।।
गुण है अनन्तानन्त, शक्तियाँ अनन्तानन्त ।
पर्यायें भी त्रिकालवर्ती, हैं अनन्तानन्त ।।
देखो! देखो!! बस जाननहार ज्ञानमय आगर ।।1।।
उत्पाद-व्यय और ध्रौव्य युक्तं सत् सहज जानो ।
उत्पाद-व्यय निरपेक्ष सत् निज ध्येय पहिचानो ।।
होओ निमग्न भव्य अन्तर उछले सुख सागर ।।2।।
पर द्रव्यों से न्यारी, अहो चैतन्यमय सत्ता ।
परभावों से न्यारी, त्रिकाल शुद्ध ध्रुव सत्ता ।।
सौभाग्य से पाया अरे, छोड़ो नहीं पाकर ।।3।।
अद्भुत अकृत्रिम चित्स्वरूप ही है उपादेय ।
इससे विरुद्ध जो विकल्प सर्व ही है हेय ।।
होओ सुखी यह अन्तरंग भेदज्ञान कर ।।4।।
देखे बिना निज भाव को दु:ख पाये भरमाये ।
होवे निहाल एक क्षण भी दर्श जो पाये ।।
हुए अनन्तों सिद्ध भगवन् आत्म पद ध्याकर ।।5।।
स्रोत: जिनवाणी भक्ति, पृष्ठ ८१