तर्ज : चित्स्वरूप महावीर…
देखी वीर जिनेन्द्र, मूरति ज्ञानमयी ।। टेक ।।
दर्शन से जिनराज सहज ही, मेरी अन्तर्दृष्टि भयी।
अक्षय अद्भुत तुमसी प्रभुता दीखी, अन्तर तृप्ति भयी।। 1।।
भासे अपद इन्द्र चक्री पद,प्रभो उदासी सहज भयी।
रम्य विषय भी नहीं सुहावें, दृष्टि निज में अचल भयी ।। 2 ।।
प्रगटे प्रभु निर्ग्रन्थ अवस्था, सहज रूप आनन्दमयी।
हो जग से निरपेक्ष परिणति, आत्मलीन वैराग्यमयी ।। 3।।
अचल अनूपम शिवपद प्रगटे, यही भावना सहज भयी।
चरणों में प्रभु शीश नवाऊँ, मुक्तिमहल की राह लही ।। 4।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १२०
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’