देखे हैं जिनराज कैसे मगन | dekhe haim jinaraja kaise magana

तर्ज : देखो मुनिराज निज ध्यान में मगन…

देखे हैं जिनराज कैसे मगन ।। टेक ।।

निज में मगन हैं, निज में मगन, अन्तर नगन हैं, बाहर नगन।
धन्य अकिंचन रूप अहो ! धनि वीतरागी स्वरूप अहो ।।
दर्शन से आतम की लागे लगन ।। 1 ।।

शोभे जो प्रभुता, अद्भुत प्रभुता, अन्तर से आई, अन्तर समाई ।
धन्य है चेतन रूप अहो, धन्य है ज्ञायक स्वरूप अहो ।।
दर्शन से पावन होवे जीवन ।। 2 ।।

आवे न वाणी में, आवे न चिंतन में, ज्ञान में आवे, प्रत्यक्ष दिखावे।
फिर भी दिखावे न अन्त अहो ! प्रभुवर के गुण हैं अनन्त अहो ।।
चिन्तन करत हो विवेकी सुमन ।। 3 ।।

जानो शुद्धातम, मैं हूँ शुद्धातम, कारण परमातम, शाश्वत परमातम।
प्रभु जैसा निश्चल रूप अहो, जयवन्तो शुद्ध चिद्रूप अहो ।।
प्रभु सम ही अपने में होओ मगन ।। 4 ।।


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ६९ से ७०
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’