देख दूसरों के वैभव अरु, भोग कभी नहीं ललचाऊँ | Dekh Dusron ke Vaibhav aur Bhog Kabhi Nahin Lalchaaun

देख दूसरों के वैभव अरु, भोग कभी नहीं ललचाऊँ।
जग की झूठी सुख-सुविधाओं में, नहिं मन को मैं भरमाऊँ ॥ टेक ॥

ख्याति-लाभ जग के मिथ्या पद, अहो ! जिनेश्वर नहीं चाहूँ ।
किंचित् शुभ परिणामों के फल से, स्वर्गादिक नहीं भाऊँ ॥ 1 ॥

हे जिन स्वामी यही भावना, अब सम्यक् श्रद्धान लहूँ ।
सम्यक् ज्ञानाभ्यास करूँ नित, विषय चाह में नहीं रहूँ ॥ 2 ॥

भेदज्ञान को भाते-भाते, मैं वैराग्य बढ़ा पाऊँ ।
धारूँ साधु दशा अविकारी, निज स्वभाव में रम जाऊँ ॥ 3 ॥

विनशें राग-द्वेष दुःखकारी, ज्ञाता-दृष्टा रह जाऊँ ।
होवे प्रगट स्वयं की प्रभुता, ध्रुव परमातम पद पाऊँ ॥ 4 ॥

अहो ! परम आदर्श महेश्वर, अशरीरी अविकारी हो ।
भाव वंदना ज्ञानमयी नित ही, चैतन्य विहारी हो ॥ 5॥


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ४०१ से ४०२
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’

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