दया निधि वीतरागी देव, तेरी शरण आये हैं।
प्रभो ! सर्वज्ञ जग त्राता, तुम्हें हम शीस नाये हैं ।। टेक ।।
बुद्धि-बल वीर्यशाली हों, विपद में धैर्यशाली हों।
सदाचारी अटल प्रणवीर हों, सौभाग्य शाली हों।।
वीर वरदान ऐसा हो, सद्-आशा ले के आये हैं।। 1।।
अहिंसा-सत्य-अपरिग्रह, हमारा ध्येय बन जाये।
क्रोध-मद-लोभ-माया का, बुरा संसर्ग हट जाये ।।
सभी दुर्गुण हटाने को, गुणाकर शरण आये हैं।। 2।।
सभी से मित्रता राखें, करें सेवा गुणीजन की।
दुःखी जन पर दयालु हो, रखें हम स्वच्छता मन की ।।
रहें मध्यस्थ सुख-दुख में, भावना ले के आये हैं।। 3 ।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ६५ से ६६
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’