दर्शन पायो आनन्द छायो, सम्यक् भेदज्ञान प्रगटायो।। टेक ।।
वीतरागता देख आपकी, जगत् असार दिखायो।
इन्द्रिय-भोग दुःखमय भासे, चिदानन्द पद भायो।। 1।।
धन्य-धन्य प्रभु स्वाश्रित जीवन, मुक्त ज्ञानमय पायो।
सहज दिगम्बर रहित अडम्बर, निर्ग्रन्थ रूप सुहायो ।। 2 ।।
सहज सुशोभित सहज पूर्ण प्रभु, अन्तर में दरशायो।
तृप्त हुआ स्वयमेव स्वयं में, मिथ्या मोह नशायो।। 3।।
निरतिचार ब्रह्मचर्य सुवर्ते, यही भाव उर आयो।
अविरल ध्याऊँ ब्रह्म रूप निज, सविनय शीस नवायो ।। 4 ।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ७३ से ७४
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’