तर्ज : देखो पार्श्वप्रभु की मूरत सबको आनंददाता है …
दर्शन नेमिनाथ का सबको, परमानन्द प्रदाता है।
परमानन्द प्रदाता है, ज्ञानानन्द प्रदाता है।। टेक।।
ब्याह समय होकर विरत, दीक्षा ली मुनिनाथ ।
पशुओं का तो था निमित्त, जग को किया सनाथ।। 1।।
आप स्वयं आदर्श हो, स्वयं परम पद पाय।
स्वानुभूत मारग कह्यो, सबको मंगलदाय।। 2।।
मौन भाव से कह रहे, इन्द्रिय सुख असार।
उत्तम संयम ग्रहण कर, होओ भव से पार।। 3।।
नाथ ! यही है भावना, राग-द्वेष विनशाय।
परिणति निज में लीन हो, निज प्रभुता विलसाय।। 4।।
और नहीं कुछ चाह है, तृप्त हुआ स्वयमेव ।
निज में संतुष्ट हो, नमन करूँ हे देव।। 5।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १०७
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’