तर्ज : कह सकूँ नहिं हुआ मोहि …
दर्शकर जिनराज के आनंद अपरम्पार हो।
दर्शकर जिनराज के वर्तुं सु जाननहार हो।। 1।।
दर्शकर जिनराज के करना नहीं कुछ दीखता।
दर्शकर प्रत्यक्ष प्रभु परिपूर्ण ज्ञायक दीखता।। 2।।
दर्शकर जिनराज के दुर्मोह दुखमय नाशिया।
दर्शकर जिनराज के सु ज्ञान भानु प्रकाशिया।। 3।।
दर्शकर जिनराज के भव-भोग सो मन भागिया।
दर्शकर जिनराज के वैराग्य में चित पागिया।। 4।।
दर्शकर जिनराज के नाशें सहज परभाव हैं।
दर्शकर जिनराज के विकसें सहज निजभाव हैं ।। 5 ।।
दर्शकर जिनराज के शिवपद दिखे आसान है।
दर्शकर भासित हुआ आतम स्वयं भगवान् है।। 6।।
दर्शकर जिनराज का परिणति सहज निर्मल हुई ।
दर्शकर जिनराज का जिन-भावना जागृत हुई ।। 7।।
नाशें सु विषय- कषाय जिनवर आप सम निज में रखूँ।
दृष्टि धर निष्काम निजपद नाथ चरणों में नमूँ ।। ४।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ५५ से ५६
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’