तर्जः घड़ी जिनराज दर्शन की…
दर्श जिनराज का पाया, सहज आनंद विलसाया।
सर्व संक्लेश विनशाया, भ्रमण का अंत ही आया।। टेक ।।
प्रभो ! दर्शन का फल पाऊँ, दशा निर्ग्रन्थ प्रगटाऊँ ।
स्वयं में तृप्त हो जाऊँ, स्वयं में लीन हो जाऊँ ।।
यही इक भाव उमगाया ।। सहज. ।। 1 ।।
उपाधिमय है संसारा, देव ! प्रत्यक्ष निहारा।
सर्व सम्बन्ध हैं झूठे, सर्व संकल्प हैं झूठे ।।
विकल्पों में न सुख पाया ।। सहज. ।। 2 ।।
आपको देखते जिनवर, मिटा दुर्मोहतम सत्वर ।
स्वानुभूति सु प्रगटाई, प्रतीति तत्त्व की आयी ।।
समाधिमय स्वपद भाया ।। सहज. ।। 3 ।।
सहज निश्चिंत हो स्वामी, सहज निर्द्वन्द्व हो स्वामी।
शुद्ध चिद्रूप नित ध्याऊँ, परिणति आप सम पाऊँ ।।
सत्य जिनमार्ग मन भाया ।। सहज. ।। 4 ।।
कहूँ उपकार प्रभु कैसे ? कहूँ माहात्म्य प्रभु कैसे।
आप सम आपको जाना, हदय जिनरूप में साना।।
शीस चरणों में प्रभु नाया ।। सहज. ।। 5 ।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ४७
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’