दरसन तेरा मन भाये
दरसन तेरा मन भाये ॥टेक॥
तुमकौं देखि त्रिपति नहिं सुरपति, नैन हजार बनावै ॥
समोसरन में निरखै सचिपति, जीभ सहस गुन गावै ।
कोड़ कामको रूप छिपत है, तेरो दरस सुहावै ॥१॥
आँख लगै अंतर है तो भी, आनंद उर न समावै ।
ना जानों कितनों सुख हरिको, जो नहिं पलक लगावै ॥२॥
पाप नासकी कौन बात है, ‘द्यानत’ सम्यक पावै ।
आसन ध्यान अनुपम स्वामी, देखें ही बन आवै ॥
दरसन तेरा मन भाये ॥३॥
Artist: पं. द्यानतराय जी
स्रोत: nikkyjain.github.io (पं द्यानतराय कृत भजन)
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