दरबार सजा चेतन राजा का।।टेक।।
गुण अनन्त शाश्वत दरबारी, सहजरूप विलसाय।
है दरबार असंख्य प्रदेशी, चैतन्य प्रकाश रह्यो छाय।।1।।
शक्ति अनन्तों सदा जगमगे, महिमा कही न जाय।
कारण शुद्ध पर्याय से तन्मय, आनंदरूप विलसाय ।।2।।
तृप्त स्वयं में मग्न स्वयं में, वीर्य अनंत उछलाय।
अशरीरी चैतन्य चक्रवर्ती, प्रभुता अनन्त दिखाय ।।3।।
पूर्ण अपूर्ण शुद्ध परिणतियाँ, रही तहँ शीश नवाय।
सहज पूज्य चेतन राजा को,पूज पूज्य कहलाय । । 4 ।।
अन्तर्मुख उपयोग हुआ अब, सहज सदा दरशाय।
हुआ निहाल रही नहीं वांछा, आनंद रहो वरषाय।।5।।
स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’