चिन्मात्र स्वरूपं आनन्द रूपं समयसार अविकार रे | cinmatra svarupam ananda rupam samayasara avikara re

चिन्मात्र स्वरूपं आनन्द रूपं समयसार अविकार रे

चिन्मात्र स्वरूपं आनन्द रूपं समयसार अविकार रे ।
हो अनुभव सुखकार प्रभो ।।टेक।।

सब ही संयोग वियोग रूप, पर्याय विनाशी जानी,
क्षणभंगुर चंचल चपला सम, बाह्य विभूति मानी ।
आश्रय योग्य एक शुद्धात्म, हुआ सत्य निरधार रे ।।1।।

भोग रोग की खाना महा, अकुलतामय दु:खदाई,
बंध रूप भव-भव भटकावें, आज समझ में आई ।
हुई सहज निवृत्ति आनन्दमय, चाह न रही लगार रे ।।2।।

नहिं अन्यत्र कहीं रस आवे, निजानन्द रस पायो,
सहज एकत्व-विभक्त परम शोभित चिद्रूप लखायो ।
जगी सहज रुचि होय लीनता निज में मंगलकार रे ।।3।।

हो निर्ग्रन्थ दशा आनन्दमय, वर्ते प्रचुर स्व-संवेदन,
विषय-कषायारम्भ रहित हो, ज्ञान-ध्यानमय मम जीवन ।
जंगल में एकाकी असंग रह, ध्याऊँ निज पद सार रे ।।4।।

नहीं द्रव्य-गुण-पर्यायों में, नहीं विश्व में कहीं मुझे,
दीखे कर्त्तृत्व की गुंजाइश, सहज पूर्णता दिखे मुझे ।
निर्विकल्प निर्द्वन्द सहज ही, जानूँ जाननहार रे ।।5।।


स्रोत: जिनवाणी भक्ति, पृष्ठ ८६ से ८७