चिंतन | Chintan

चिंतन भी चिंता ही है

-प्रो. वीरसागर जैन

प्रायः कहा जाता है कि चिंतन करो, चिंता मत करो, चिंता बुरी चीज है और चिंतन अच्छी चीज है, चिंता विष है और चिंतन अमृत, इत्यादि। यह बात एक अपेक्षा से प्राथमिक लोगों के लिए ठीक कही जा सकती है, परंतु वास्तव में देखा जाए तो चिंतन भी चिंता ही है, विष ही है, अमृत नहीं है। जिस प्रकार चिंता आकुलता उत्पन्न करती है, उसी प्रकार चिंतन भी विकल्पात्मक होने के कारण आकुलता ही उत्पन्न करता है। शास्त्रों में उसे भी यही कहा है, उपादेय नहीं। अतः यदि हमें सचमुच निराकुलता चाहिए तो चिंता की भांति चिंतन को भी हेय और दुःखरूप समझना होगा, तभी हम उससे ऊपर उठकर आत्मानंद में मग्न हो सकेंगे।