तर्ज : भला किसी का कर न सको…
चिन्ता चाहे जितनी कर लो, नहीं सार निकलने वाला है।
आकुलता का फल आकुलता, सुख लेश न मिलने वाला है ।। टेक ।।
चिन्ता तज चिन्तन करो अरे ! परिपूर्ण स्वरूप हमारा है।
है कमी नहीं निज में, पर से कुछ कभी न आने वाला है ।। 1 ।।
पर-आश्रित भाव विकारी ही, भव-भव में दुःख के कारण हैं।
अपना सुख तो अपने में ही, अपने से आने वाला है।। 2।।
अपना ज्ञानानन्दमय घर तज, बाहर में व्यर्थ भटकना है।
आत्मा ही निश्चय परमात्मा, अविनाशी प्रभुता वाला है।। 3 ।।
अपनी महिमा का आदर कर, संकल्प-विकल्प तजो झूठे।
वह कर्त्ता कैसे हो सकता, जो केवल जाननहारा है।। 4।।
देखनहारा हूँ देख अहो, जाननहारा हूँ जान अहो।
भव-क्लेश सहज मिट जावेंगे, प्रगटे मुक्ति अविकारा है ।। 5 ।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ३६४ से ३६५
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’