चिदरायगुन सुनो मुनो प्रशस्त गुरुगिरा
चिदरायगुन सुनो मुनो प्रशस्त गुरुगिरा ।
समस्त तज विभाव, हो स्वकीयमें थिरा ।।चिदरायगुन.।।
निजभावके लखाव बिन, भवाब्धिमें परा ।
जामन मरन जरा त्रिदोष, अग्निमें जरा ।।१।। चिदरायगुन. ।।
फिर सादि औ अनादि दो, निगोदमें परा ।
तहं अंकके असंख्यभाग, ज्ञान ऊबरा ।।२।। चिदरायगुन. ।।
तहां भव अन्तरमुहूर्तके कहे गनेश्वरा ।
छयासठ सहस त्रिशत छतीस, जन्म धर मरा ।।३।। चिदरायगुन. ।।
यौं वशि अनंतकाल फिर, तहांतै नीसरा ।
भूजल अनिल अनल प्रतेक, तरुमें तन धरा ।।४।। चिदरायगुन. ।।
अनुंधरीसु कुंथु काणमच्छ अवतरा ।
जल थल खचर कुनर नरक, असुर उपज मरा ।।५।। चिदरायगुन. ।।
अबके सुथल सुकुल सुसंग, बोध लहि खरा ।
‘दौलत’ त्रिरत्न साध लाध, पद अनुत्तरा ।।६।। चिदरायगुन. ।।
Artist: कविवर श्री दौलत राम जी
स्रोत: दौलत भजन सौरभ, पृष्ठ १२० से १२१