चिदानंद भूलि रह्यो सुधिसारी
(राग उझाज जोगीरासा)
चिदानंद भूलि रह्यो सुधिसारी, तू तो करत फिरै म्हारी म्हारी ॥टेर ॥
मोह उदय तैं सबही तिहारी जनक मात सुत नारी।
मोह दूरि कर नेत्र उघारो, इन में कोई न तिहारी ॥१॥
झाग समान जीवना जोवन परवत नाला कारी।
धनपति रंक समान सबन को जात न लागे वारी ॥२॥
जुवां मांस मधु अरु वेश्या, हिंसा चौरी जारी ।
सप्त व्यसन में रत्त होय के निजकुल कीन्ही कारी ॥३॥
पुन्य पाप दोउ लार चलत हैं यह निश्चय उरधारी ।
धर्म द्रव्य तोय स्वर्ग पठावै पाप नरक में डारी ॥४ ॥
आतम रूप निहार भजो जिन धर्म मुक्ति सुखकारी ।
बुधमहाचंद जानि यह निश्चय, जिनवर नाम सम्हारी ॥५ ॥
स्रोत: आध्यात्मिक भजन संग्रह (सं. श्री सौभाग्यमल जैन, पं. टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर, २००६), भजन १४ (विभिन्न कवियों के भजन)