छांडि दे या बुधि भोरी, वृथा तनसे रति जोरी
छांडि दे या बुधि भोरी, वृथा तनसे रति जोरी ।।टेक।।
यह पर है न रहै थिर पोषत, सकल कुमल की झोरी ।
यासौं ममता कर अनादितैं, बंधो कर्मकी डोरी,
सहै दुःख जलधि हिलोरी ।।१।।छांडि ।।
यह जड़ है तू चेतन यौं ही, अपनावत बरजोरी ।
सम्यक्दर्शन ज्ञान चरण निधि, ये हैं संपति तोरी,
सदा विलसौ शिवगोरी ।।२।।छांडि ।।
सुखिया भये सदीव जीव जिन, यासौं ममता तोरी ।
‘दौल’ सीख यह लीजे पीजे, ज्ञानपियूष कटोरी,
मिटै परचाह कठोरी ।।३।।छांडि ।।
Artist: कविवर श्री दौलत राम जी
स्रोत: दौलत भजन सौरभ, पृष्ठ १४३
अर्थ
यह देह पर है, पुदुगल है। इसको पोषण करते-करते भी यह स्थिर नहीं रह पाती - नष्ट हो जाती है। यह मैल से भरी झोली है। इसमें ममता कर अर्थात् अपनापन मानकर अनादिकाल से कर्म-डोर से अपने को बाँधता रहा है और दुःख के सागर में लहरों के साथ डूबता उत्तराता रहा है।
यह जड़ है तू चेतन यौं ही, अपनावत बरजोरी।
यह जड़ है, चेतन नहीं है। तू निरर्थक ही इसका पक्षपाती होकर इसको अपना मान रहा है। तेरी संपत्ति तो रत्नत्रय सम्यक्दर्शन-ज्ञान चारित्र ही है। उस मोक्षरूपी लक्ष्मी को सदैव भोगो।
स्रोत: दौलत भजन सौरभ।
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