चेतनजी! तुम जोरत हो धन
चेतनजी! तुम जोरत हो धन, सो धन चलत नहीं तुम लार
जाको आप जान पोषत हो, सो तन जलकै है छार॥चेतन. ॥१॥
विषय भोगके सुख मानत हो, ताको फल है दुःख अपार॥चेतन. ॥२॥
यह संसार वृक्ष सेमरको, मान कह्यो हौं कहत पुकार॥चेतन. ॥३॥
Artist: पं. द्यानतराय जी
स्रोत: आध्यात्मिक भजन संग्रह (सं. श्री सौभाग्यमल जैन, पं. टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर, २००६), भजन १९
अर्थ
हे चेतन ! तुम धन संग्रह में लगे हो। पर यह धन तुम्हारे साथ नहीं जायेगा। तुम अपना जानकर जिस शरीर का पोषण करते हो, वह शरीर भी साथ नहीं जाता, वह भी जलकर के खाक/भस्म हो जाता है। तुम विषयभोग में सुख मानते हो, उनका फल अपार दुःख ही मिलता है। यह संसार सेमर के वृक्ष के समान है। सेमर वृक्ष के फूल देखने में सुन्दर होते हैं, परन्तु उसके फल निस्सार होते हैं। ज्ञानीजन पुकार करके तुमको समझा रहे हैं, चेता रहे हैं, तुम यह मान लो, समझ लो।
स्रोत: द्यानत भजन सौरभ, पद 99।
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