चेतन ! अब तो मोह को छोड़ो ॥ टेक ॥
साँचे देव-धर्म-गुरु ध्याओ, तत्त्वों का निर्णय उर लाओ।
भेदज्ञान कर स्व-पर भाव का, बाहर से मुख मोड़ो ॥ 1 ॥
बाह्य जगत् में सार नहीं, पर में तेरा व्यापार नहीं है।
उदासीन हो अंतर में ही, सहज परिणति जोड़ो ॥ 2 ॥
रसिक जनों को अति ही रुचिकर, भव्यों को है अति ही हितकार।
चिदानंद रस को आस्वादो, दुर्विकल्प सब तोड़ो ॥ ३॥
ये देहादि पड़ोसी सम हैं, कर्म भिन्न रागादि विषम हैं।
ध्रुव ज्ञायक अपना पहिचानो, झूठी ममता तोड़ो ॥ 4 ॥
कौतूहली तत्त्व का होकर, निज शुद्धातम का अनुभव कर।
जीवन सफल करो शिव पाओ, भव-भ्रमण को छोड़ो ॥ 5 ॥
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ३५५ से ३५६
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
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