चेतन, तोहि न नेक संभार
चेतन, तोहि न नेक संभार ।
नख सिख लों दिढबन्धन बैढे, कौन करे निरबार ॥टेक॥
जैसे आग पषान काठ में, लखिय न परत लगार ।
मदिरापान करत मतवारो, ताहि न कछू विचार ॥
चेतन, तोहि न नेक संभार ॥१॥
ज्यों गजराज पखार आप तन, आपहि डारत छार ।
आपहि उगल पाट कौ कोरा, तनहिं लपेटत तार ॥
चेतन, तोहि न नेक संभार ॥२॥
सहज कबूतर लोटन को सो, खुले न पेच अपार ।
और उपाय न बने ‘बनारसि’, सुमरन भजन अधार ॥
चेतन, तोहि न नेक संभार ॥३॥
Artist: पं. बनारसीदास जी
स्रोत: nikkyjain.github.io (पं बनारसीदास कृत भजन)
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