चेतन काहे को पछतावता, यहाँ कोई नहीं है तेरा
(राग ख्याल तमाशा व गजल)
चेतन काहे को पछतावता, यहाँ कोई नहीं है तेरा ॥टेर ॥
हम न किसी के कोई न हमारा, यह जग सारा द्वन्द्व पसारा ।
पक्षी का सा रैन गुजारा, भोर भये उड़ जावता,
कहीं और जगह कर डेरा ॥१॥
इक दिन है तुझ को भी जाना, फिर पीछे उलटा नहिं आना।
पड़ा रहै सब माल खजाना, फिर काहे चित्त भ्रमावता,
झूठा घर वार बसेरा ॥२॥
जिसको भाई बेटा बताता, वोही तेरी चिता बनाता।
खप्पन को भी हर ले जाता बे रहम हो आग लगावता,
शिर फोड़ भस्म कर ढेरा ॥३॥
जो रोवै सो लोक दिखैया, या रोवै सुख अपने को भैया।
तेरे लिये कछु नाहिं करैया, क्यों न प्रभु गुण गावता,
जासु वेग मिटै भव फेरा ॥४ ॥
स्रोत: आध्यात्मिक भजन संग्रह (सं. श्री सौभाग्यमल जैन, पं. टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर, २००६), भजन १७ (विभिन्न कवियों के भजन)